महाराष्ट्र के 265 तालुकों में सूखा घोषित, किसानों के सामने बड़ा संकट
इस साल कमज़ोर मानसून ने महाराष्ट्र के किसानों की कमर तोड़ दी है। खेतों में खड़ी फसलें सूख रही हैं, और अब राज्य सरकार ने 265 तालुकों को आधिकारिक तौर पर सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है। यह फैसला 25 सितंबर 2026 को राहत एवं पुनर्वास विभाग के सरकारी प्रस्ताव (जीआर) के ज़रिए सामने आया।
कौन से इलाके सबसे ज़्यादा प्रभावित?
सूची में मराठवाड़ा और विदर्भ के बड़े हिस्से हैं, यानी वही क्षेत्र जो सालों से खेती के संकट और किसान आत्महत्याओं के कारण चर्चा में रहते हैं। उत्तरी और पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ सूखे इलाके भी इसमें आते हैं।
- मराठवाड़ा - लातूर, बीड, धाराशिव, नांदेड़, परभणी, छत्रपति संभाजीनगर
- विदर्भ - यवतमाल, अमरावती, अकोला, वर्धा, नागपुर, चंद्रपुर
तालुकों की संख्या के हिसाब से यवतमाल (16) सबसे आगे है। उसके बाद जलगाँव (15), फिर नांदेड़, अमरावती और नागपुर (14-14) आते हैं। बुलढाणा में 13 और चंद्रपुर में 12 तालुके शामिल हैं। साफ़ है कि सूखा किसी एक कोने तक सीमित नहीं, पूरे राज्य में फैला है।
बारिश के आंकड़े क्या कहते हैं?
आईएमडी के अनुसार 1 जून से 25 सितंबर तक राज्य में मानसून की कुल कमी करीब 18 प्रतिशत रही, लेकिन ज़िलों के स्तर पर तस्वीर ज़्यादा गंभीर है। 36 में से 20 ज़िलों में बारिश ज़रूरत से कम हुई।
ज़िला बारिश में कमी
सोलापुर 57%
बीड 49%
हिंगोली 48%
जालना 46%
धाराशिव 45%
अकोला 41%
मराठवाड़ा के कई ज़िलों को सामान्य बारिश का बस आधा या उससे कुछ ज़्यादा हिस्सा ही मिल पाया।
सिर्फ़ कम बारिश नहीं, लंबे अंतराल ने भी बिगाड़ा खेल
आईआईटी बॉम्बे के एसोसिएट प्रोफेसर कार्तिकेयन लंका के मुताबिक़ इस बार लगातार बारिश की जगह गीले और सूखे दौर बार-बार बदलते रहे। कभी तेज़ या बिखरी बारिश से मिट्टी थोड़ी देर नम होती, पर फिर लंबे सूखे में वाष्पीकरण और पौधों की वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया से नमी खत्म हो जाती। फसल की बढ़त के नाज़ुक चरणों में यही अंतराल सबसे भारी पड़ा। सोयाबीन, मक्का और कपास पर इसका सबसे ज़्यादा असर माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हाल ही में लातूर, धाराशिव और सोलापुर के प्रभावित इलाकों का दौरा किया था। खबरों के मुताबिक़ अकेले मराठवाड़ा में कृषि विभाग का अनुमान है कि करीब 45 दिन के सूखे में कम से कम एक-चौथाई खड़ी फसल खराब हो चुकी है।
सरकार ने कौन सी राहत दी है?
प्रभावित तालुकों के लिए घोषित पैकेज में ये बातें शामिल हैं:
- भू-राजस्व में छूट
- फसल ऋण का पुनर्गठन और कृषि कर्ज़ की वसूली पर रोक
- कृषि पंपों के बिजली बिल में रियायत (जल संकट वाले गांवों में कनेक्शन नहीं कटेंगे)
- स्कूल-कॉलेज के छात्रों की परीक्षा फीस माफ़
- रोज़गार गारंटी योजना के तहत काम का विस्तार
- ज़रूरत पड़ने पर टैंकर से पीने का पानी, पशुओं के लिए चारा और जल संरक्षण कार्य
मुआवज़ा कब मिलेगा?
यह सबसे अहम सवाल है। फसल नुकसान का सीधा मुआवज़ा अभी घोषित नहीं हुआ है। जीआर के अनुसार तय प्रक्रिया पूरी होने के बाद सहायता की घोषणा अलग से होगी। ये तालुके अभी "ट्रिगर-1" में हैं, जो सूखा आकलन का पहला चरण है।
जिला कलेक्टरों को पंचनामा, फसलों की तस्वीरें और जीपीएस टैग वाले रिकॉर्ड के साथ ज़मीनी आकलन शुरू करने को कहा गया है। उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने भी कहा है कि असली मदद राशि इसी आकलन के बाद तय होगी। यानी किसान का पंचनामा में दर्ज नुकसान ही आगे की राहत की नींव बनेगा।
देश की स्थिति और अल नीनो
महाराष्ट्र कर्नाटक के बाद सूखा घोषित करने वाला दूसरा राज्य है। कर्नाटक 240 में से 177 तालुके पहले ही सूखाग्रस्त घोषित कर चुका है। आईआईटी गांधीनगर के इंडिया ड्रॉट मॉनिटर के मुताबिक़ 23 सितंबर तक देश का लगभग 51.2% हिस्सा सूखे की चपेट में था, और महाराष्ट्र का 84.1% इलाका प्रभावित था। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार अल नीनो मज़बूत हो चुका है और फरवरी 2027 तक रह सकता है, यानी चिंता जल्दी खत्म होती नहीं दिखती।
राहत के शुरुआती कदम उठ चुके हैं, पर किसानों की असली उम्मीद मुआवज़े की घोषणा पर टिकी है। अगर आपके इलाके में फसल खराब हुई है, तो पंचनामा और सर्वे में अपना नुकसान ज़रूर दर्ज करवाएं।

एक टिप्पणी भेजें