Asia-Pacific Economic Cooperation (APEC) Climate Centreभारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून पर मंडराया सूखे का खतरा

 

एल नीनो की चेतावनी: भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून पर मंडराया सूखे का खतरा

Asia-Pacific Economic Cooperation (APEC) Climate Centre


 

हाल ही में एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन (APEC) क्लाइमेट सेंटर ने एल नीनो को लेकर एक अलर्ट जारी किया है, जो आने वाले महीनों में मौसम की अनियमितताओं की ओर इशारा कर रहा है। इस चेतावनी से भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के पूर्वानुमान को लेकर काफी चिंता बढ़ गई है, क्योंकि एल नीनो अक्सर सूखे जैसी स्थितियां पैदा करता है।

 

दुनिया भर में तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव

 रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में तापमान सामान्य से ज्यादा रह सकता है, सिवाय दक्षिणी उष्णकटिबंधीय महासागर के कुछ इलाकों के। खासतौर पर भारत, पश्चिमी यूरोप, मध्य एशिया, रूस, ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी दक्षिण अमेरिका जैसे क्षेत्रों में गर्मी का असर ज्यादा दिखने की       संभावना है मौसमी पूर्वानुमान की बात करें तो मार्च से मई तक उष्णकटिबंधीय उत्तरी प्रशांत, उपोष्णकटिबंधीय दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत इलाकों में बारिश सामान्य से ज्यादा हो सकती है। वहीं, समुद्री महाद्वीप, भूमध्यरेखीय दक्षिण प्रशांत और उत्तर-पश्चिमी प्रशांत में कम वर्षा का अनुमान है।

 

 

भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

 सेंटर ने यह भी आगाह किया है कि भारत, मध्य अमेरिका और उत्तरी दक्षिण अमेरिका में बारिश सामान्य से कम हो सकती है। साथ ही, उष्णकटिबंधीय अटलांटिक और दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया में भी कम वर्षा की आशंका है। भारत के लिए यह खबर इसलिए ज्यादा परेशान करने वाली है, क्योंकि 2023 में भी एल नीनो की वजह से मानसून कमजोर रहा था। उस साल देश के करीब 25% हिस्से में सूखा पड़ा, जिससे दालों, मोटे अनाजों और धान की पैदावार पर बुरा असर पड़ा। नतीजतन, भारत को चावल के निर्यात पर रोक लगानी पड़ी। एल नीनो आमतौर पर एशिया, खासकर भारत और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में लंबे सूखे और शुष्क मौसम को बढ़ावा देता है।


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जून से अगस्त 2026: मानसून का निर्णायक दौर

 जून से अगस्त 2026 के दौरान भूमध्यरेखीय और पश्चिमी उत्तरी प्रशांत क्षेत्र में ज्यादा बारिश की उम्मीद है। तापमान के लिहाज से मार्च-मई में उत्तर-पूर्वी अटलांटिक, भूमध्य सागर, मध्य अफ्रीका, पश्चिम एशिया, भूमध्यरेखीय हिंद महासागर, पूर्वी एशिया, उत्तरी प्रशांत, उष्णकटिबंधीय उत्तरी प्रशांत, दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत, कैरिबियन, मैक्सिको, उपोष्णकटिबंधीय उत्तरी अटलांटिक, दक्षिण-पूर्वी दक्षिणी प्रशांत और मध्य दक्षिण अमेरिका जैसे इलाकों में गर्मी ज्यादा रहेगी।

 यूरोप, आर्कटिक सागर, रूस, ग्रीनलैंड, मध्य एशिया, उत्तरी अफ्रीका, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और मध्य तथा दक्षिण अमेरिका के ज्यादातर हिस्सों में भी तापमान ऊपर रह सकता है। रिपोर्ट में ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश इलाकों और पूर्वी कनाडा में गर्मी बढ़ने की बात कही गई है। हालांकि, उत्तरी अटलांटिक के कुछ हिस्सों में ठंडक ज्यादा हो सकती है।

 वर्षा के पैटर्न पर नजर डालें तो मध्य से पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत और पश्चिमी उत्तरी अफ्रीका के तट पर बारिश सामान्य स्तर के आसपास रह सकती है। लेकिन मध्य भूमध्यरेखीय दक्षिण प्रशांत और समुद्री महाद्वीपों के कुछ इलाकों में कम वर्षा की संभावना काफी बढ़ गई है। पूर्वी भूमध्यरेखीय हिंद महासागर, पश्चिमी और मध्य उत्तरी प्रशांत, भूमध्यरेखीय पूर्वी प्रशांत के अपतटीय क्षेत्रों, दक्षिणी हिंद महासागर, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया, मध्य एशिया, उष्णकटिबंधीय पश्चिमी अटलांटिक और उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी अटलांटिक में भी बारिश कम होने का ट्रेंड दिख रहा है। पश्चिम एशिया में वर्षा सामान्य के करीब रह सकती है।

 

गर्मी और वर्षा के प्रमुख रुझान

 गर्मी के पैटर्न में उत्तर-पूर्वी अटलांटिक, ग्रीनलैंड, भूमध्य सागर, पूर्वी यूरोप, पश्चिम एशिया, ज्यादातर अफ्रीका, उत्तरी हिंद महासागर, दक्षिणपूर्व एशिया, पश्चिमी चीन, पूर्वी एशिया, उत्तरी प्रशांत, पश्चिमी उत्तरी अमेरिका, उपोष्णकटिबंधीय उत्तरी अटलांटिक, मैक्सिको, कैरेबियाई सागर, मध्य अमेरिका, उत्तरी दक्षिण अमेरिका और उष्णकटिबंधीय प्रशांत जैसे क्षेत्रों में तापमान काफी ऊंचा रहने की मजबूत संभावना है। पश्चिमी यूरोप, मध्य एशिया, रूस, भारत, ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी दक्षिण अमेरिका में भी गर्मी बढ़ सकती है।

 वहीं, भूमध्य रेखा से दूर उत्तरी प्रशांत महासागर, उष्णकटिबंधीय पश्चिमी उत्तरी प्रशांत, पश्चिमी अफ्रीका, भूमध्यरेखीय हिंद महासागर और मध्य दक्षिण अमेरिका में ज्यादा बारिश की उम्मीद है। कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट मौसम की चुनौतियों पर ध्यान दिलाती है, और भारत जैसे देशों को कृषि और जल संसाधनों की प्लानिंग में सतर्क रहने की जरूरत है।

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