भारत में सब्जी की खेती करने वाले किसानों के बीच Pea Farming यानी मटर की खेती एक बेहद लाभदायक विकल्प बनकर उभरी है। खासकर "अगेती" यानी जल्दी की जाने वाली मटर की खेती किसानों को कम समय में ज्यादा मुनाफा देती है। यदि आप भी इस सीजन Pea Farming शुरू करने की सोच रहे हैं, तो यह Complete Guide आपके लिए ही है। इसमें हम बुवाई के सही समय से लेकर Hybrid Seeds, Basal Dose, सिंचाई और मंडी भाव तक की हर जानकारी विस्तार से देंगे।
Pea Farming क्यों है इतनी फायदेमंद?
पारंपरिक फसलों की तुलना में Pea Farming यानी मटर की खेती कम समय में तैयार हो जाती है और बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। खासतौर पर अगेती मटर, जो समय से पहले मंडी में पहुंचती है, उसे ₹100 से ₹150 प्रति किलो तक का भाव मिल जाता है। सही तकनीक और Hybrid Seeds के इस्तेमाल से एक एकड़ में ₹1.5 लाख से लेकर ₹3 लाख तक की कमाई संभव है। यही वजह है कि हर साल किसानों का रुझान Pea Farming की तरफ बढ़ रहा है।
1. बुवाई का सही समय और तापमान
Pea Farming में सफलता की पहली शर्त है सही समय पर बुवाई करना।
तापमान का महत्व: जब क्षेत्र का तापमान 28°C से 31°C के बीच आ जाए और यह 3 से 5 दिनों तक स्थिर बना रहे, तभी बुवाई शुरू करनी चाहिए। गलत तापमान पर बुवाई करने से अंकुरण (germination) प्रभावित होता है।
उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान आदि) के किसानों को 25 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच बुवाई करनी चाहिए।
मध्य व दक्षिण भारत (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि) में किसान 1 सितंबर से 20 सितंबर के बीच बुवाई कर सकते हैं।
समय पर बुवाई करने से ही फसल अगेती मंडी में पहुंचती है और बेहतर भाव मिलता है, इसलिए Pea Farming में यह पहला और सबसे जरूरी कदम है।
2. खेत की तैयारी और पलेवा
अच्छी उपज के लिए खेत की तैयारी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
सबसे पहले खेत की गहरी जुताई करें ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए और जड़ों का विकास अच्छे से हो सके।
गोबर की खाद - प्रति एकड़ कम से कम 3 ट्रॉली अच्छी तरह सड़ी हुई देशी गोबर की खाद डालना जरूरी है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।
पलेवा (सिंचाई) - मटर की बुवाई हमेशा पर्याप्त नमी वाले यानी पलेवा किए हुए खेत में करनी चाहिए। सूखे खेत में बीज बोकर बाद में पानी देने से फफूंद जनित रोग और उकटा रोग (wilting) की समस्या हो सकती है, जिससे पूरी फसल प्रभावित हो सकती है।
3. Basal Dose - प्रति एकड़ खाद और दवाओं की पूरी जानकारी
Pea Farming में Basal Dose का सही अनुपात में इस्तेमाल फसल की सेहत के लिए बेहद जरूरी है। यह मिश्रण खेत की आखिरी जुताई के समय डाला जाता है:
सामग्री
मात्रा (प्रति एकड़)
डी.ए.पी. (DAP) 35 से 50 किलो
एम.ओ.पी. (पोटाश) 25 से 35 किलो
बेंटोनाइट सल्फर 10 किलो
फफूंदनाशक (थायोफिनेट मिथाइल) 500 ग्राम
कीटनाशक (कार्टैप हाइड्रोक्लोराइड) 3 से 5 किलो (या 3 किलो रीजेंट)
बेंटोनाइट सल्फर न सिर्फ फफूंद जनित बीमारियों से बचाव करता है बल्कि उत्पादन बढ़ाने में भी मदद करता है। यह Basal Dose फसल की शुरुआती ग्रोथ के लिए बुनियाद का काम करता है।
4. Seed Rate और बेहतरीन Hybrid Seeds
Seed Rate - अगेती Pea Farming के लिए प्रति एकड़ 35 से 40 किलो बीज की आवश्यकता होती है।
सही Hybrid Seeds का चुनाव उपज और गुणवत्ता दोनों तय करता है। बाजार में उपलब्ध शीर्ष 4 उन्नत Hybrid Seeds इस प्रकार हैं
जी.एस. 10 (यूपीएल एडवांटा)
मुशो (सिनजेंटा)
ए.पी.-3 (उत्तर भारत में सबसे ज्यादा प्रचलित)
सलोनी (श्रीराम)
ये सभी Hybrid Seeds न सिर्फ जल्दी तैयार होते हैं बल्कि रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बेहतर रखते हैं, जिससे Pea Farming में जोखिम कम होता है।
5. बुवाई का तरीका और खरपतवार नियंत्रण
सबसे बेहतर विधि: सीड ड्रिल मशीन से बुवाई करना सर्वोत्तम तरीका माना जाता है क्योंकि इससे बीज एक समान गहराई और दूरी पर पड़ता है। इसके अलावा छिटकवा विधि या बेड मेकर मशीन से भी बुवाई की जा सकती है।
खरपतवार नियंत्रण: बुवाई के तुरंत बाद, जब खेत में नमी हो, तब 1 लीटर प्रति एकड़ पेंडामेथालिन का छिड़काव करें। इससे खरपतवार उगने से पहले ही नियंत्रित हो जाता है, जिससे फसल को पोषक तत्वों के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता।
6. बुवाई के बाद की देखभाल (15 से 30 दिन)
Pea Farming में शुरुआती 30 दिन फसल के भविष्य के लिए बेहद अहम होते हैं:
15 से 20 दिन बाद: एन.पी.के. 19:19:19 (1-2 ग्राम प्रति लीटर पानी) के साथ कार्बेन्डाजिम + मैंकोजेब या थायोफिनेट मिथाइल मिलाकर छिड़काव करें। इससे पौधों की ग्रोथ तेज होती है और फफूंद जनित बीमारियों से बचाव होता है।
30 दिन पर सिंचाई - अगर खेत में नमी कम महसूस हो तो स्प्रिंकलर (फव्वारा विधि) से बहुत हल्की सिंचाई करें। ध्यान रहे कि खेत में पानी रुकना नहीं चाहिए, वरना जड़ें सड़ने का खतरा रहता है।
कीट एवं रोग प्रबंधन के अतिरिक्त सुझाव
Pea Farming के दौरान सफेद लट और दीमक जैसी समस्याएं आम हैं, इसीलिए Basal Dose में ही कीटनाशक शामिल किया जाता है। इसके अलावा नियमित रूप से खेत का निरीक्षण करते रहें ताकि किसी भी बीमारी के शुरुआती लक्षण समय रहते पहचाने जा सकें और उचित कदम उठाए जा सकें।
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अगेती Pea Farming से कितना मिलेगा मुनाफा?
यदि सही समय पर, वैज्ञानिक तरीके से और गुणवत्तापूर्ण Hybrid Seeds के साथ बुवाई की जाए, तो मटर मंडियों में सबसे पहले पहुंचती है। इससे किसानों को ₹100 से ₹150 प्रति किलो तक का मंडी भाव मिलता है। परिणामस्वरूप, प्रति एकड़ ₹1.5 लाख से ₹3 लाख तक की शानदार कमाई की जा सकती है। यही कारण है कि Pea Farming आज के समय में किसानों के लिए एक स्मार्ट और मुनाफेदार विकल्प बन चुकी है।
Pea Farming यानी मटर की खेती में सफलता पाने के लिए सही समय पर बुवाई, उपयुक्त Basal Dose, गुणवत्तापूर्ण Hybrid Seeds और समय पर सिंचाई जैसी बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। यह Complete Guide आपको हर चरण में मदद करेगी ताकि आप भी इस सीजन बंपर उत्पादन और अच्छा मुनाफा कमा सकें।
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मटर की खेती की ओर अधिक वैज्ञानिक जानकारी के लिए ICAR की Field Pea Agro-Advisory देखे |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: Pea Farming के लिए सबसे अच्छा तापमान क्या है?
उत्तर: 28°C से 31°C के बीच का तापमान बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।
प्रश्न 2: कौन से Hybrid Seeds सबसे ज्यादा उपज देते हैं?
उत्तर: जी.एस. 10, मुशो, ए.पी.-3 और सलोनी जैसे Hybrid Seeds किसानों के बीच सबसे लोकप्रिय हैं।
प्रश्न 3: Basal Dose कब डालना चाहिए?
उत्तर: Basal Dose हमेशा खेत की आखिरी जुताई के समय डाला जाता है ताकि पोषक तत्व मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाएं।

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