खेती-किसानी हमारे देश की रीढ़ है, और पिछले कुछ वर्षों में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) तथा हमारे वैज्ञानिकों ने मिलकर जो उपलब्धियां हासिल की हैं, उन्होंने देश के कृषि भविष्य को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। फसल सुधार, उन्नत बीज उत्पादन, आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी और जलवायु अनुकूल खेती के मोर्चे पर देश ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। आज हमारी खेती केवल खाद्यान्न उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पोषण सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से मुकाबला करने और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक नए मुकाम पर पहुंच चुकी है।
आइए, विस्तार से जानते हैं कि पिछले एक दशक में भारत के कृषि क्षेत्र में किस तरह के क्रांतिकारी बदलाव आए हैं और कौन-कौन सी बड़ी उपलब्धियां दर्ज की गई हैं।
1. खेत फसलों में ऐतिहासिक वृद्धि - जलवायु के अनुकूल नई किस्में
किसी भी देश की कृषि प्रणाली की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि वहां किस प्रकार के बीजों और फसलों का विकास किया जा रहा है। साल 1969 से लेकर 2025 तक के लंबे सफर में, राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा प्रणाली (NARES) ने कुल 7,206 खेत फसल किस्मों का विकास, विमोचन और अधिसूचना किया है। इसमें अनाज की 3,569 किस्में, तिलहन की 1,131 किस्में, दलहनों की 1,259 किस्में, रेशा फसलों की 693 किस्में, चारा फसलों की 308 किस्में, गन्ने की 180 किस्में और अन्य संभावित फसलों की 66 किस्में शामिल हैं।
लेकिन असली और बड़ा बदलाव पिछले एक दशक (2014-2025) के दौरान देखने को मिला है। इन दस वर्षों में कुल 3,236 खेत फसल किस्मों को विकसित और अधिसूचित किया गया है, जो इस बात का प्रमाण है कि शोध की रफ्तार कितनी तेज हो चुकी है। इस एक दशक में विकसित किस्मों का वर्गीकरण इस प्रकार है:
अनाज - 1,576 किस्में
तिलहन - 444 किस्में
दलहन - 473 किस्में
रेशा फसलें - 408 किस्में
चारा फसलें - 205 किस्में
गन्ना - 96 किस्में
अन्य फसलें - 34 किस्में
इनमें सबसे गौर करने वाली बात यह है कि इन 3,236 किस्मों में से लगभग 93% यानी 2,996 किस्में पूरी तरह से जलवायु के अनुकूल (Climate-Resilient) हैं। ये ऐसी किस्में हैं जो बदलते मौसम, सूखे, अत्यधिक बारिश और तापमान में उतार-चढ़ाव जैसी गंभीर चुनौतियों का आसानी से सामना कर सकती हैं। इनमें अनाज की 1,455, तिलहन की 397, दलहन की 446, रेशा फसलों की 392, चारा फसलों की 168, गन्ने की 96 और अन्य फसलों की 27 जलवायु-सहिष्णु किस्में शामिल हैं।
2. पोषण सुरक्षा और बायो-फोर्टिफाइड फसलों की क्रांति
आज के समय में केवल पेट भरना ही काफी नहीं है, बल्कि भोजन में पोषण का होना भी उतना ही आवश्यक है ताकि कुपोषण से लड़ा जा सके। इस दिशा में भारत ने बायो-फोर्टिफाइड (Bio-fortified) फसलों के माध्यम से एक बड़ी छलांग लगाई है। पिछले एक दशक के दौरान करीब 185 बायो-फोर्टिफाइड किस्में विकसित की गई हैं।
इस दिशा में सबसे तेज प्रगति वर्ष 2020 से 2025 के बीच देखने को मिली है, जब अकेले इस पांच साल की अवधि में 142 बायो-फोर्टिफाइड किस्में जारी की गईं। इन पौष्टिक किस्मों में मुख्य अनाज, बाजरा और दलहन-तिलहन शामिल हैं:
गेहूं - 54 किस्में
मक्का - 39 किस्में
चावल - 9 किस्में
सरसों - 8 किस्में
बाजरा और रागी - 6-6 किस्में
मूंगफली - 3 किस्में
कुटकी - 2 किस्में
जौ, ज्वार, चेना, कंगनी, मसूर, चना, फाबा बीन और गोभी सरसों 1-1 किस्में
ये बायो-फोर्टिफाइड किस्में आयरन, जिंक और आवश्यक विटामिनों से भरपूर हैं, जो देश के आम नागरिकों और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
3. जीनोम संपादन (Genome Editing) और आधुनिक जीनोमिक्स
पारंपरिक खेती के साथ-साथ विज्ञान ने अब अत्याधुनिक तकनीकों को अपना लिया है, जिसमें जीनोम संपादन और जीनोमिक हस्तक्षेप सबसे आगे हैं। भारत ने इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
दुनिया की पहली जीनोम संपादित चावल की किस्में - भारत ने दुनिया की पहली जीनोम संपादित चावल की किस्में—पूसा DST चावल और DRR धान 100 (कमला) की पहचान की है। ये किस्में अधिक सूखे की स्थिति और लवणता (नमक वाली मिट्टी) को सहने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। साथ ही, यह अगेती परिपक्वता के साथ सामान्य से 19% तक ज्यादा पैदावार देती हैं।
सरसों में सुधार - सरसों की फसल में जीनोम संपादन तकनीक के उपयोग से 3% से 4% अधिक तेल वाली स्थिर पीले बीज की किस्में प्राप्त हुई हैं, जो किसानों के लिए अधिक लाभदायक साबित हो रही हैं।
नए जीन और क्यूटीएल - चावल में OsSRDP और qGN4.1 जैसे नए जीन और क्यूटीएल (QTL) ने बहुतनाव सहिष्णुता (Abiotic Stress Tolerance) को बढ़ाया है और 15% से 20% तक की उपज वृद्धि में योगदान दिया है। इसके अलावा, उच्च घनत्व वाली एसएनपी (SNP) सारणियों और जीडब्ल्यूएएस (GWAS) ने अरहर, चौलाई और मोठ बीन जैसी फसलों में विशेष गुणों की खोज को बेहद आसान बना दिया है।
4. जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) और उन्नत कीट प्रबंधन
फसलों को कीटों, बीमारियों और सूत्रकृदियों (Nematodes) से बचाना किसानों के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। जैव प्रौद्योगिकी के हस्तक्षेप ने इस सुरक्षा चक्र को बेहद मजबूत कर दिया है:
सूत्रकृमि नियंत्रण - रूट-स्पेसिफिक प्रमोटर्स (Root-Specific Promoters) के विकास से जड़ों में होने वाले सूत्रकृमि संक्रमण को 60% से 90% तक कम कर दिया गया है, जिससे पौधों की जड़ें सुरक्षित रहती हैं।
कीट व्यवहार और बीटी अरहर - कीटों के व्यवहार पर जीनोमिक स्तर पर गहरी समझ विकसित की गई है। इसके साथ ही, खतरनाक फली छेदक (Pod Borer) कीट से लड़ने के लिए प्रतिरोधी 'बीटी अरहर' वंशक्रमों का सफल विकास किया गया है, जो फसल को भारी नुकसान से बचाते हैं।
5. बीज उत्पादन और गुणवत्ता प्रबंधन में आत्मनिर्भरता
खेती की सफलता इस बात पर टिकी होती है कि किसान को समय पर और उच्च गुणवत्ता वाला बीज मिले। भारत ने इस मोर्चे पर शानदार रिकॉर्ड बनाया है। वर्ष 2024-25 के दौरान देश में प्रजनक बीज (Breeder Seed) का उत्पादन बढ़कर 109,370.2 क्विंटल तक पहुंच गया, जबकि इसकी कुल मांग केवल 69,850.8 क्विंटल थी—यानी मांग से कहीं अधिक बीज का उत्पादन हुआ। इसके अलावा, कुल गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन 433,114.7 क्विंटल रहा, जो निर्धारित लक्ष्यों से काफी अधिक है।
बीज प्रबंधन प्रणाली को और अधिक पारदर्शी और आधुनिक बनाने के लिए कई नए नवाचार लाए गए हैं:
रैपिड सीड वायबिलिटी टेस्ट किट - इससे बीजों की अंकुरण क्षमता और जीवनक्षमता की जांच तुरंत और सटीक तरीके से की जा सकती है।
यूनिप्राइम सीड प्राइमिंग टेक्नोलॉजी (Uniprime Seed Priming Technology) - इस तकनीक ने बीजों के अंकुरण और शुरुआती विकास को और बेहतर बना दिया है, जिससे पौधे मजबूत और स्वस्थ उगते हैं।
6. बागवानी फसलों में विविधीकरण और नई सफलताएं
केवल खेत फसलों तक ही नहीं, बल्कि बागवानी के क्षेत्र में भी विज्ञान का जादू देखने को मिला है। रिपोर्टिंग अवधि के दौरान 18 प्रमुख बागवानी फसलों की 28 नई किस्मों को अधिसूचित किया गया है।
इनमें आम, अमरूद, बेल जैसी फल फसलों, आलू और प्याज जैसी सब्जियों, नारियल, विभिन्न मसाले, बहुमूल्य औषधीय पौधे और पौष्टिक मशरूम की ऐसी किस्में शामिल हैं जो जलवायु के प्रति पूरी तरह लचीली हैं, उच्च पैदावार देती हैं और पोषण के मामले में भी बेहतरीन गुणवत्ता से भरपूर हैं।
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कुल मिलाकर देखा जाए तो, पिछले एक दशक की ये तमाम उपलब्धियां इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और हमारे देश के कृषि वैज्ञानिक सतत कृषि विकास (Sustainable Agriculture) के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। फसलों की उत्पादकता में वृद्धि, जलवायु के प्रति उनका लचीलापन, उन्नत जैव प्रौद्योगिकी और देश की खाद्य व पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में यह यात्रा मील का पत्थर साबित हो रही है। इन आधुनिक तकनीकों और उन्नत बीजों के दम पर आज का भारतीय किसान भविष्य की हर चुनौती का सामना करने और कृषि क्षेत्र में एक नया इतिहास रचने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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